पाचवीं अनुसूची क्या है विस्तार से समजिये

21#रामकृपाल_भगत_Vrs_State_of_Bihar के सुप्रीम कोर्ट का 9 बेंच का जजमेंट का आधार

जोहार!!

#असल में पांचवी अनुसूची को आज तक किसी ने ढंग से नहीं समझा.. संविधान की पांचवी अनुसूची में राज्यपाल की कार्यपालिका शक्ति का विस्तारीकरण के लिए Crown की अनुमति आवश्यक है..(हिज मजेस्टी, हर मजेस्टी )

#क्या है हकीकत??

#गवर्नमेंट_ऑफ_इंडिया_एक्ट 1935 के 91,92 में लिखे excluded area और partially excluded are को क्रमशः पांचवी और छठी अनुसूची के रूप में संविधान में डाला गया डाला.. जिसका शासन-प्रशासन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के अनुरूप ही होगा..

#सेक्शन 91, 92 को पांचवी अनुसूची और छठी अनुसूची में कार्यपालिका शक्ति का विस्तारीकरण गवर्नमेंट ऑफ इंडिया 1935 के अंतर्गत ही होगा और उसकी #लोक अधिसूचना आवश्यक है..(Reference रामकृपाल भगत Vrs state of Bihar )
#पर जानकारी के अभाव और बिना तथ्य के कुछ आदिवासी बुद्धिजीवी अनुसूचित क्षेत्रों में #लोक_अधिसूचना की बात को मानने से इंकार करते हैं ..

यही कारण है कि आज तक पांचवी अनुसूची के 10 राज्यों के राज्यपाल की कार्यपालिका शक्ति का विस्तारीकरण नहीं हुआ है.. तो अनुसूचित क्षेत्रों में घूम रही पुलिस और प्रशासन भी असंवैधानिक है..
#रामकृपाल भगत Vrs स्टेट ऑफ बिहार 1969 में इन सब बातों का जिक्र है ..
अर्थात् खूंटी के कलेक्टर साहब की नियुक्ति का लोक अधिसूचना अगर जारी नहीं की गई है तो कलेक्टर साहब उस अनुसूचित क्षेत्र में एक सामान्य व्यक्ति हैं.. और जितने भी पुलिस प्रशासन अनुसूचित क्षेत्र में घूम रहे हैं वह भी एक सामान्य व्यक्ति हैं..( Reference GOI Act 1935, रामकृपाल भगत vrs state of Bihar 1969)

ठीक उसी प्रकार पांचवी अनुसूची के पैराग्राफ 5 (1) में उल्लेखित संसद की या राज्य की विधानमंडल की कोई विशिष्ट अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों को लागू नहीं है, अगर उसकी लोक अधिसूचना जारी नहीं की गई है..
जैसे:- #गौ रक्षा अधिनियम, #सीएनटी एसपीटी एक्ट भी झारखंड के 13 अनुसूचित राज्यों को छोड़कर बाकी के 11 राज्यों में सीधे लागू होंगे..

उदाहरण के तौर पर
1.) राज्यपाल की कार्यपालिका शक्ति का विस्तारीकरण पांचवी अनुसूची के उपबंधों के अधीन हुआ है या नहीं इस बात की आरटीआई की गई के द्वारा जानकारी मांगी जा सकती है या
2.) संसद या विधान मंडल द्वारा बनाई गई कोई विशिष्ट अधिनियम के लागू होने की लोक अधिसूचना मांगी जा सकती है..

पांचवी अनुसूची को “संविधान के अंदर संविधान” कहा जाता है और कहा जाए तो पांचवी अनुसूची क्षेत्र में संविधान भी लागू नहीं होगा, क्योंकि संविधान भारत के राज्य क्षेत्रों के लिए है (Reference GOI Act 1935)..
#हकीकत_और_खुलासा..
15 अगस्त 1947 के सत्ता के हस्तांतरण के पहले भारत सरकार GOI act 1935 से संचालित होती थी,
GOI act 1935 के सेक्शन 311 में भारत को तीन भागों में बाँटा गया..
1.) भारत
2.) भारत का राज्य क्षेत्र
3.) Tribal area..

#संविधान निर्माण के बाद संविधान में इसी सेक्शन के दो भागों को पहली अनुसूची में डाला गया..
1.) भारत
2.) भारत का राज्य क्षेत्र
#Tribal area( वर्जित क्षेत्र 91और आंशिक वर्जित क्षेत्र92) को डाला नहीं गया, या कहा जाए, तो धोखा देकर उसे दो भागों संविधान में क्रमशः tribal area यानी 6वीं अनुसूची(excluded area , सेक्शन92) के 4 राज्य और scheduled area ( partially excluded area, section 91) यानी 5वीं अनुसूची के 10 राज्य के रूप में डाल दिया गया.. (पर इन 14 राज्य के कार्यपालिका शक्ति का विस्तार नहीं किया, क्यों कि राष्ट्रपति जी को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है)

संविधान निर्माण के पहले Tribal area का मतलब संपूर्ण आदिवासी क्षेत्र थे, संविधान निर्माण के बाद 4 राज्य को tribal area(244 (2) और 10 अनुसूचित राज्यों को scheduled area (244 (1) कहा गया ..
#अब इससे सरकार को फायदा यह हुआ, कि IPC और CRPC में लिखा था, कि ये कानून Tribal area को लागू नहीं होंगे,
, जहाँ संविधान निर्माण बाद tribal area के रूप में बस 4 राज्य में लागू होने लगे, और जानकारी के अभाव में 10 अनुसूचित राज्य में IPC , CRPC थोपे जाने पर आदिवासी जेल जाने लगे.. 😂😂

केन्द्र सरकार के तीन अंग होते हैं..
1.) कार्यपालिका- प्रशासन और कानून लागू करना
2.) न्यायपालिका – मौजूदा कानूनों पर निर्णय देना
3.) विधायिका – कानून बनाना

प्रधानमंत्री विधायिका (कानून ) के प्रति जवाबदेह होता है, और कार्यपालिका शक्ति(कानून लागू करवाना) का प्रधान राष्ट्रपति होते हैं ..
वर्तमान में जिस तरह बहुमत की सरकार है, मान लिया जाए कि कोई कानून आदिवासी हित में नहीं है , तो सामान्यतः #आदिवासी_बुद्धिजीवियों के अनुसार वह कानून आदिवासियों पर थोपा जा सकता है, क्योंकि #विधायिका और #न्यायपालिका भी बहुमत की सरकार की है, और #न्यायपालिका भी मौजूदा संविधान और सामान्य कानून के हिसाब से ही निर्णय देगी..
बुद्धिजीवियो के अनुसार 5वीं अनुसूची को राष्ट्रपति संशोधित कर सकते हैं .. 😂😂

माने #चित_भी_उनकी_और_पट_भी..
इसी लिए वोट देकर हम अपने कब्र के लिए गड्डा खोदते हैं .. और यह जानते हुए भी #आदिवासी_बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए पूरे आदिवासी समाज को हाशिए पर ढकेलते आ रहे हैं …

#पर बधाई हो..
इन 70 सालों में जो नहीं हुआ, वो अब होगा..

#रामकृपाल_भगत_Vs_State_of_Bihar 1969 के सुप्रीम कोर्ट के 9 संवैधानिक खंडपीठ द्वारा दिए निर्णय में यह साफ लिखा है कि
5 वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्रों में अभी तक GOI 1935 के कुछ सेक्शन प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू हैं .. इन क्षेत्रों में सामान्य कानूनों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है, और राज्यपाल के द्वारा शासन , प्रशासन और नियंत्रण भी आदिवासी के लिए कल्याणकारी और GOI act 1935 के अंतर्गत ही होगा..

#और राज्यपाल के कार्यपालिका शक्ति के विस्तारीकरण के लिए “क्राऊन” या हिज मजेस्टी की अनुमति आवश्यक है.. 5वीं, 6ठी अनुसूची के संशोधन के लिए भी..
साथ ही लोक अधिसूचना(public notifications) ना होने के कारण ये सारे थोपे गए सामान्य कानून असंवैधानिक हैं ..

अर्थात् अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों को ही शासन प्रशासन को ही कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका की शक्ति प्राप्त है, और पारंपरिक ग्राम सभा (डोकलो सोहोर, पड़हा, मुण्डा मानकी, गामेती, माँझी परगना, हाजोर भूमकाल, पटेल व्यवस्था को विधि का बल हजारों साल पहले से प्राप्त है, जिसको संविधान के अनुच्छेद 13 (3) बल प्रदान करता है..

इसलिए हमारे गाँव में सामान्य कानून नहीं, ( पेसा भी सामान्य कानून है) बल्कि “अबुआ दिसोम अबुआ राज ” के तर्ज पे पारंपरिक ग्राम सभा #माँझी, #डोकलो सोहोर, #मुण्डा मानकी, पड़हा, हजोर बूमकाल, पटेल, गमेती का दस्तूर कानून यानी कि जिसमें #कार्यपालिका , #न्यायपालिका और #विधायिका की शक्ति और विधि का बल प्राप्त है , ही चलेगा..

#ना_लोक_सभा_ना_विधान_सभा
#सबसे_ऊँची_ग्राम_सभा ( सुप्रीम कोर्ट का वेदान्ता जजमेंट)IMG-20170409-WA0013

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